interest targeted(रुचि को लक्ष्य बनाया)💐
बचपन की बात कर रहा हूं ।मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर बालाघाट में हम सभी परिवार सहित किराए के मकान में रहा करते थे। सादा जीवन था। पिताजी ग्रामीण परिवेश से थे। शासकीय सेवा में आने के पूर्व उन्होंने जबलपुर में काफी मुश्किल हालात में पढ़ाई लिखाई की ।और साथ ही वे पार्ट टाइम जॉब भी करते थे ।
हम भाई बहनों को अपने उन दिनों के बारे में बताया करते। यह भी कहते हैं। बिना मेहनत के लिए कुछ नहीं मिलता। अपने जीवन में कुछ बनना चाहते हो तो कंफर्ट जोन से बाहर निकलो। जैसे मैं गांव से निकलकर शहर आया। मेहनत की पढ़ाई की काम किए ।तब कहीं जाकर आज यहां हूं पिताजी बहुत संघर्षों के बाद ही नौकरी पर आ सके थे।
हम सभी भाई बहनों को मिलाकर 8 सदस्य परिवार में थे ।क्योंकि पिताजी शिक्षा के क्षेत्र में थे। जो परिवार में अनुशासन बहुत था। अपने छात्रों को बहुत अनुशासित रखा करते। और घर पर अनेकानेक छात्रों को निशुल्क पढ़ाया करते। हम सभी भाई बहनों ने सरकारी स्कूलों में अध्ययन किया। और पैदल ही हम सभी अपने अपने विद्यालय शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते थे। पिताजी के पास है ।
साइकिल थी। जब अपनी ड्यूटी से वापस घर आते तब हमारी जिम्मेदारी होती थी। साइकिल को साफ करना टायरों में हवा भरना आदि यह सब करने में बड़ा आनंद भी आता था।क्योंकि सफाई बगैर करने के बाद चार पांच चक्कर लगाने को मिल जाते थे ।इस बहाने की जांच लें साइकिल सही चल रही है। अथवा नहीं पिताजी हमारे वहां ने समझते थे। कभी कुछ नहीं कहते थे।
वैसे मैं बचपन में तकनीकी रूप से कुशलता मेरा रुझान इस ओर ही रहता था। पढ़ाई लिखाई में बहुत अधिक होशियार तो नहीं था। लेकिन 60-70 परसेंट अंको से उत्तीर्ण होता रहा।विद्यालय में गीत-संगीत गतिविधियों में भागीदारी आदि भी करता रहता है ।
घर पर तो वही ठोका पिटी करना और उनके कल पुर्जों को खोलकर देखना बनाना तो दूर अक्षर बिगाड़ देना और की फिर बनाने के लिए क्या किया जा सकता है। इसकी सामग्री जुटा ना यह सब काम करना आदत बनती जा रही थी। जिज्ञासु प्रवृत्ति होने के कारण कई बार पिटाई भी पिताजी कार्य दिया करते थे । डांट खाना तो आम बात थी।
खैर अपनी रूची और आदत तो खैर वैसी ही थी। तभी घर पर बल्लभ बदलना हो अथवा किल्ले ठोकने हो पंखे लटकाने हो इन कामों को करने में मुझे बड़ा आनंद आता था ।और यदि किसी अन्य को तकनीकी कार्य करते देखता तो बड़ी रुचि से ध्यान से देखता और समझने का प्रयास करता रहता ।मेरी जिज्ञासाओं के उत्तर पाने और उनके बारे में जानकारी हासिल करने में मुझे मसूरी सर से मदद मिल जाती थी।
जो हमारे घर आते जाते थे ।मसूरी सर वह डिप्लोमा होल्डर व इंजीनियरिंग ड्रॉइंग के शिक्षक भी थे। समय गुजरने के साथ साथ पिताजी ने सोचा कि इसके लिए तकनीकी शिक्षा ही ठीक रहेगी रूचि के अनुसार मेरा आईआईटी में एडमिशन करा दिया।
हमारी आदतें लगन रुचि और उसके आधार पर पिताजी ने हमारे जीवन का लक्ष्य बनाया सही समय पर लिए गए ।उनके फैसले ने हमें बच्चों के जीवन को निर्णायक आकार दिया उनका नजरिया वाकई अद्भुत रहा।
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